Wednesday, November 27, 2019

मैं निडर हूँ|







शाम के ठीक 7 बजे गुप्ता निवास की बेल बजती हैं और अंदर से आवाज़ आती हैं , "अभी आई!"।
दरवाज़ा खुलता हैं और मुस्कराते हुए माँ कहतीं है, "आ गया बेटा?", मायूस और निराशा भरी आवाज़ में रमेश कहता  हैं "हा माँ, आ ही गया।"

बेटे को ऐसे परेशनी में देख के माँ कहती हैं "तू बैठ, मैं पानी लाई।"
फिर माँ पानी की ग्लास ला के बेटे को देती हैं।
बेटा ग्लास टेबल में रख देता हैं।
माँ बेटे की परेशानी देख उसके पास जाके बैठ जाती हैं।

फिर वह पानी की ग्लास दुबारा उठा के बेटे को देती हुईं पूछती हैं, "क्या हुआ बेटा इतना परेशान क्यों है?"

बेटा नज़रे चुराते हुए कहता है "कुछ नहीं माँ, मैं ठीक हूँ।" और फिर से पानी नहीं लेता।
ऐसे कुछ देर सवाल जवाब के बाद , बेटे के आँखों से पानी झलक ही जाता हैं और अपनी लरखराती आवाज़ में बोलता हैं,

"माँ मैं डर रहा हूँ , मेरे सपने ,जो देखे है मैंने वह पूरे होंगे की नहीं। मैं कामियाब होऊंगा की नहीं, माँ मैं डर रहा हूँ | आज यूही बातों बातों में मैंने कुछ लोगों से अपने सपने का जीकर किया तो लोग हँसने लगे माँ, बोलते हैं - तू कुछ नहीं कर पायेगा...., माँ मैं डर रहा हूँ। कहीं उनकी बाते सच न हो जाये, कहीं मेरे सपने खो न जाये, माँ मैं डर रहा हूँ। ना जाने क्यों खुद पे विश्वास खो रहा हूँ माँ।"

फिर माँ बेटे के हाथों को पकड़ कर मुस्कुराते हुए बोलती, बस इतनी सी बात से तू घबरा गया , तू डर गया, तू तो मेरा निडर बेटा हैं। ऐसे हिम्मत हारेगा तो सब को जवाब कैसे देगा।

फिर माँ ने एक प्यारी सी कविता सुनाई अपने बेटे को।


             सपने तेरे हैं उसपे तेरा ही हक़ है,
  आँखों में सपने भर के तू आगे बढ़ते जा,    
  डर को देके मात तू निडर बनता जा।


मुश्किले आयेगी तेरी राह  मे ,  
अपने संकल्प का हाथ पकड़ कर तू आगे बढ़ते जा,   
 डर को देके मात तू निडर बनता जा।

कुछ आयेंगे ऐसे पल जो तोड़ देंगे तुम्हें अंदर तक,  
"लक्ष्य" को करके याद तू आगे बढ़ते जा,   
डर को देके मात तू निडर बनता जा।


  आसान नहीं होती  क़ामयाबी की मंजिल, 
खुद में विश्वास रखकर तू आगे बढ़ते जा,  
डर को देके मात तू निडर बनता जा।

जब कोई न दे साथ निरास मत होना, 
 खुद के साथ तू होके खड़ा आगे बढ़ते जा,  
 डर को देके मात तू निडर बनता जा।

 सब हसेंगे तेरे सपनों को सुन कर, 
 तू सहमना मत, होके अटल आगे बढ़ते जा, 
डर को देके मात तू निडर बनता जा।

माँ की यह हिम्मत भरी कविता सुन कर बेटे में मानो एक नई ऊर्जा आ गई।

फिर बेटा मुस्कुराते हुऐ माँ से केहता हैं, 

माँ "मैं निडर हूँ", अब मैं अपने सारे सपने पूरे करुँगा, निडर बन आगे बढते रहुँगा। अब नहीं  घबराना लोगो की बातों से, अब नही डरना ।

उसके बाद रमेश ने कभी भी पीछे मुड़ के नही देखा और अपने सारे सपने पूरे किए।

दोस्तों हमारे जीवन मे भी कभी न कभी ऐसे पल आ ही जाते हैं  जो हमें डरा देते हैं मगर हमें  हर डर को हरा कर जीवन मे आगे बढ़ते रहना चाइये ।

आशा करता हूँ आपको मेरी ये कविता पसंद आई होगी , और आप भी निडर बनके अपने जीवन मे आने वाली सारी मुसीबतो का सामना डट के करेंगे | 


अगर आपको ये  कविता पसंद आई तो शेयर करे और कमेंट कर के हमें बताये।

मुस्कुराते रहे ,निडर बनते रहे | 


आपके समय के लिए धन्यवाद्  | 

विशाल अग्रवाल
Thepolestar4u.

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